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|रचनाकार='वहशत' रज़ा अली कलकत्वी
}}
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ऐ अहल-ए-वफ़ा ख़ाक बने काम तुम्हारा
आग़ाज बता देता है अंजाम तुम्हारा
जाते हो कहाँ इश्क़ के बेदाद-कशो तुम
उस अंजुमन-ए-नाज़ में क्या काम तुम्हारा
ऐ दीदा ओ दिल कुछ तो करो ज़ब्त ओ तहम्मुल
लबरेज़ मय-ए-शौक़ से है जाम तुम्हारा
ऐ काश मिरे क़त्ल ही का मुज़्दा वो होता
आता किसी सूरत से तो पैग़ाम तुम्हारा
‘वहशत’ हो मुबारक तुम्हें बद-मस्ती ओ रिंदी
जुज़ इश्क़-ए-बुताँ और है क्या काम तुम्हारा
</poem>
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ऐ अहल-ए-वफ़ा ख़ाक बने काम तुम्हारा
आग़ाज बता देता है अंजाम तुम्हारा
जाते हो कहाँ इश्क़ के बेदाद-कशो तुम
उस अंजुमन-ए-नाज़ में क्या काम तुम्हारा
ऐ दीदा ओ दिल कुछ तो करो ज़ब्त ओ तहम्मुल
लबरेज़ मय-ए-शौक़ से है जाम तुम्हारा
ऐ काश मिरे क़त्ल ही का मुज़्दा वो होता
आता किसी सूरत से तो पैग़ाम तुम्हारा
‘वहशत’ हो मुबारक तुम्हें बद-मस्ती ओ रिंदी
जुज़ इश्क़-ए-बुताँ और है क्या काम तुम्हारा
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