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|रचनाकार='फना' निज़ामी कानपुरी
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मुझे प्यार से तेरा देखना मुझे छुप छुपा के वो देखना
मेरा सोया जज़्बा उभारना तुम्हें याद हो की न याद हो

रह ओ रस्म क़ल्ब ओ निगाह के वो तुम्हारे दावे निबाह के
वो हमारा शेख़ी बघारना तुम्हें याद हो की न याद हो

वो हमारी छेड़ वो शोख़ियाँ वो हमारा काटना चुटकियाँ
वो तुम्हारा कोहनी का मारना तुम्हें याद हो की न याद हो

कभी सर्द आहों के सिलसिले कभी ठंडी साँसों के मश्ग़ले
वो हमारी नक़लें उतारना तुम्हें याद हो की न याद हो

वो तुम्हारा शाएर-ए-ख़ुश-नवा जिसे लोग कहने लगे ‘फ़ना’
वो निसार कह की पुकारना तुम्हें याद हो की न याद हो
</poem>
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