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|संग्रह=म्हारै पांती री चिंतावां / मदन गोपाल लढ़ा
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<Poempoem>   
म्हनैं दिनूगै उठतां पाण
माचै री दावण खींचणी है।
सिराणै राखी पोथी री म्हैं
अजैं आधी कवितावां ई बांची है।
  </Poempoem>
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