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Kavita Kosh से
वह बहुत से रिश्तों से जुड़ता है
रिश्ते बनाता है उन्हें निभाता है
बड़ी सलीके से जीवन में रिश्ते बढ़ाता है|है।
कुछ पूछते है रिश्ते कैसे बनाएँ
उन्हें जीवन में किस सीमा तक निभायें
आज तो मानव स्वछंद रहना चाहता है
किसी प्रकार के बंधन में नहीं बंधना चाहता है|है।
फिर भी जीवन में रिश्ते बनते ही है
निभाना चाहो तो निभते ही है
जो उन्हें अपनी शख्सियत से निभाते है
वे रिश्तों को निभाने में कुर्बान हो जाते है
कुछ तो रिश्तों में जान की जान भी ले लेते है
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