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|संग्रह=पद-रत्नाकर / भाग- 4 / हनुमानप्रसाद पोद्दार
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<poem>नव-नीरद-नीलाभ कृष्ण तन परम मनोहर।
त्रिभुवन-मोहन रूप-राशि रमणीय सुभग वर॥
कस्तूरी-केसर-चन्दन-द्रव-चर्चित अनुपम।
अन्ग सकल सच्चिन्मय सुषमामय सुन्दरतम॥

कीर-चंचु-निन्दक निरुपम नासा-मणि राजत।
कुंचित केश-कलाप कृष्ण लख अलि-कुललाजत॥
सिर चूड़ा, शिखि-पिच्छ, मुकुट मणिमय अत्युज्ज्वल।
कर्ण-युगल कमनीय कर्णिका कुण्डल झलमल॥

कुटिल भ्रुकुटि, दृग-युगल विशद विकसित अबुज-सम।
रुचिर भंगिमा, ललित त्रिभंगी, मध्य सु-वंकिम॥
पीत वसन तडिदाभ, दशन द्युतिमय, अरुणाधर।
मुख प्रसन्न, मुसकान मधुर, मुरलिका मधुर कर॥

भक्त-भक्त नित सेवक-भक्तनुग्रह-कातर।
प्रेम-रसिक रस-प्रेम-सुधा-‌आस्वादन-तत्पर॥
व्रज-प्रिय, व्रज-जन-सखा-स्वामि-सेवक तन-मन-धन।
नन्द-यशोदा-तनय, बाल-व्रज-रमणी-जीवन॥

भगवा सा, ईश्वरता सारी तजकर।
ब्रज-जन-सुख-हित-हेतु द्विभुज निज-‌इच्छा वपु धर॥
भाद्र-‌अष्टमी, कृष्ण पक्ष, बुधवार अनुतम।
शुभ रोहिणि नक्षत्र, मध्य-रजनी मंगलतम॥

हु‌ए प्रकट श्रीनन्द-यशोदा के प्रिय सुत बन।
निज स्वरूप-वितरण करने, बन सब के निज जन॥
</poem>
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