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बोल मजूरे हल्ला बोल
काँप रही सरमाएदारी खुलके रहेगी इसकी पोल
बोल मजूरे हल्ला बोल!
ख़ून को अपने बना पसीना तेने तूने बाग लगाया है
कुँए खोदे नहर निकाली ऊँचा महल उठाया है
चट्टानों में फूल खिलाए शहर बसाए जंगल में
अपने चौड़े कंधों कन्धों पर दुनिया को यहाँ तक लाया है,बाँकी फौज कमेरों की है, तू है नही भेड़ों का गोल!बोल मजूरे हल्ला बोल!
गोदामों में माल भरा है, नोट भरे हैं बोरों में
बेहोशों को होश नही है, नशा चढ़ा है जोरों में
इसका दामन उसने फाड़ा उसका गरेबाँ इसके हाथकफनखसोटों का झगड़ा है होड़ लगी है चोरों मेंऐसे में तू हाँक लगा दे- ला मेरी मेहनत का मोल!बोल मजूरे हल्ला बोल!
सिहर उठेगी लहर नदी की, दहक उठेगी फुलवारी
सरमाएदारों का पल में नशा हिरन हो जाएगा
आग लगेगी नंदन वन में सुलग उठेगी हर क्यारी
सुन-सुनकर तेरे नारों को धरती होगी डाँवाडोलडावाँडोल !बोल मजूरे हल्ला बोल! '''रचनाकाल : मार्च 1982'''
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