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सहपाठा / श्रीनाथ सिंह

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<poem>
एक देश में जन्मे हैं सब,
एक लहू है सबके तन में।
एक तरह से हँसते हैं सब,
मुख तो देखो दर्पन में।
एक चाँद मामा है सबका,
एक तरह का माँ का प्यार।
आँसू एक निकलता सबके,
जब देता है कोई मार।
कहलाते हैं हम सब बच्चे,
चितवन सबकी एक समान।
एक मदरसे में पढ़ते हैं,
एक गुरु से एक जबान।
धनी निर्धनी ऊँच नीच का,
भेदभाव तब क्यों मानें?
अपने साथी को अपने से,
घट कर क्यों मन में जानें?
अपना और पराया कैसा?
यहाँ सभी हैं अपने लोग।
भेद भाव से भागो भाई,
समझो इसको भारी रोग।
जो सुख हमको मिला हुआ है,
वह सब को पहुँचायेंगे।
अगर नहीं तो सबके दुःख में,
शामिल हो सुख पाएंगें।
</poem>