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|रचनाकार=बैजू मिश्र 'देहाती'
|संग्रह=मैथिली रामायण / बैजू मिश्र 'देहाती'
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<poem>
तकरा प्रकट करै छल सभ क्यो,
कूदि फानि हँसि रंग विरंग।
बिदा कयल सभकें रघुनन्दन,
अपनहुँ चलला अवधनरेश।
पुष्पक यानमे सभ क्यो चढ़ला,
रहल ने क्यो रामादल शेष।
छला यानमे रामक संगे,
लखन सिया अंगद हनुमंत।
द्विविद विभीषण सुग्रीवहु छथि,
जामवंत अंगद बलबंत।
यान चलल उत्तर दिश झटपट,
छलै आयोध्या पहुँचक लक्ष्य।
राम सियाकें देखा रहल छथि,
कहाँ बनल के कालक भक्ष्य।
कुम्भकर्ण छल मरल जाहि थल,
मेघनाद केर मृत्यु स्थान।
रावण जहाँ मरल छल सेहो,
करै छला सभ राम बखान।
लैत नाम रावण केर सीता,
हँसि पड़ली किछु मनमे राखि।
बनल रहस्य रहल रामक उर,
किन्तु ने तहि क्षण सकला भाखि।
जतए जतए वन गमन कालमे,
गेल छला रघुनन्दन राम।
ताहि ताहि ऋषि मुनिक दरश हित,
गेला फेरि हित करय प्रणाम।
घूमिफीरि सभतरिसँ अएला,
तीर्थक राज प्रयाग।
प्रथिम पठौलनि हनूमानें,
सूचित करए भरथ महभाग।
संगम पहुँचि अवधपति कयलनि,?
सुर दुर्लभ जलमे स्नान।
पुनि विप्रादि दुखी जनमन हित,
बहुबिथि कयलनि दान प्रदान।
भरद्वाज आश्रम पुनि दएला,
ऋषिकें पूजन कयलनि राम।
आशीर्वाद ग्रहण कए हुनकर,
चलला प्रभू अयोध्या धाम।
ओम्हर पवन सुत पहुँचि भरथलग,
देखल हुनकर दशा विचित्र।
आँखि मुनि जप करइत रमक,
योग साधना लीन चरित्र।
हनुमत लगला बाजए मुँहसँ,
रामक यशकें विविध प्रकार।
पाछाँ हुनक आगमन कहलनि,
सुनि भरथक मन हर्ष अपार।
खोलि आँखि देखल समक्षमे,
बैसल छला बली हनुमान।
गद गद मनसँ हृदय लगौलनि,
पवन पुत्रकें दए सम्मानं
सभटा बात सुनल हनुमतसँ,
विस्तृत यश केर सुखद प्रसंग।
गेला महलमे कहलनि सभसँ,
पुलकित भेल सभक मन अंग।
पसरि गेल ई बात नगरमे,
पलमे सभ तरि चारू कात।
हरषक पाराबार कहत के,
जनु धन निशागेल अछि प्रात।
पुष्पक यान राम केर उतरल,
गंगाधारक जा ओहिपार।
गुह निषादकें कानमे पड़लनि,
अएला दौड़ि सकल परिवार।
अबितहि सभ क्यो रामक कयलनि,
चरणकमलमे दण्ड प्रणाम।
राम उठा उर लगा भ्रात सम,
छलै दृश्य तखनुक अभिराम।
बहु आशीष देल तहँ गुहकें,
देल बहुत आदर सम्मान।
देखा देलनि यगकें प्रभु तखनहि,
छोट पैघ नहि भल अभिमान।
गंगा पूजि सियाजी उठली,
पओलनि हुनकर बहुआशीष।
तखनहि आबि गेला हर्षित मन,
भरथक कुशलक संग कपीश।
चलला एम्हर यानसँ रघुवर,
सभक संग निजपुर शाकेतं
ओम्हर वशिष्ठ भरथ केर संगे,
छला ठाढ़ बहुप्रजा समेत ।
नगर द्वार पर ठाढ़ छला सभ,
देखि यान उतरल तहि ठाम।
तखनुक मिलनक दृश्य अनूपम,
हर्ष उदधि डूबल छल धाम।
सहस सहस जन उदघोषय,
सहस सहस जन फेकए फूल।
सहस सहस जन नाचय गाबए,
हर्ष लहरि नहि छूबए कूल।
खसल छला प्रभु चरण भरथजी,
विलखैत आखिक नोर बहाए।
राम उठा निज हृदय लगौलनि,
मधुर वचन कहि तोष धराए।
जन समुद्र सऽ मिलन कयल प्रभु,
क्षणमे ई छल हुनक प्रताप रहस्य।
दोसर नहि क्यो जनलक माया,
छलै ने ककरो शक्तिक वस्य।
बढ़ला प्रभु महलक दिश आगाँ,
नगरक शोभा कहल ने जाए।
तेहन सजल छल महल अटारी,
जनु नव कनियाँ रहय सजाए।
द्वार द्वार पर अइपन लीखल,
तहि पर मंगल कलश सुरम्य।
महिला सभ कर नेने आरती,
छल सबहक उत्साह अदम्यं
सुमन अटारी सभसँ बरिसए,
जहँ तहँ बाजए ढ़ोल मृदंग।
नाचाए गाबए हर्ष मनाबए,
पहिरि वस्त्र नव रंग विरंग।
स्वीकारथि सबहक अभिवादन,
सभसँ भेटथि नेह बढ़ाए।
धन्य धन्य छल सभ नर नारी,
पुनि पुनि रामक दरशन पाएं
राम पहुँचला राजमहल लग,
कौशिल्या नहि सकली रोकिं
मर्यादाकें बिसरि दौगती,
सकल ने क्यो दी हुनका टोकिं
</poem>
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