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|रचनाकार=बैजू मिश्र 'देहाती'
|संग्रह=मैथिली रामायण / बैजू मिश्र 'देहाती'
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<poem>
बहुत काल पर देखिकै दौगए,
नव वधूकें छली मातुश्री,
रामक मुँह देखए अकुलाए।
कए प्रणाम मताकें रघुवर,
गेला प्रथम कैकेयीक द्वारं
सकुचि छली बैसलि कैकेयी,
पछताबा केर लए मन भार।
मुदा रामकहि मधुर वचनसँ,
हरल हुनक मन केर संताप।
गेला सुमित्रा गृह पुनि उठिकए,
भए प्रसन्न भंजक शिवचाप।
कयल प्रणाम सुमित्रा माँकें,
देल सुमित्रा बहुँ आशीष।
धन्य छली सुत लखन पाबिकए,
संग देल वनमे जगदीश।
राम लखन अरू भरथ जानकी,
पाबि वशिष्ठक शुभ आदेश।
वनवासी केर भेस हटौलनि,
धारण कयल राजसी भेसं
गुरू वशिष्ठ दोसर दिन कहलनि,
प्राते सचिव सुमंत बजाए।
पठा दीअऽ सभतरि आमंत्रण,
राम नृपति हैता समझाए।
गेल निमंत्रण तखनहि सभतरि,
सभ अएला बहु हर्ष समेत।
ऋषी मुनी ब्राह्म देवादिक,
भेला समय पर सभ समवेत।
सवर्गहुँसँ बढ़ि नगर सजल छल,
सभमे अति सैं उत्साह।
सिंहासन छल सेहो सजाओल,
सुन्दरता केर नहि छल थाहं
मंत्रोच्चारक सं बैसला,
सिंहासन पर सिय संग राम।
देहक वसन अभूषण सज्जित,
लज्जित छला देखि शतकाम।
छत्र चंवर दंण्डादिक शोभित,
भरथ लखन शत्रुघ्नक हाथ।
उठिकए पहिने तिलक लगौलनि,
रहल ने आब धरती विपन्नं
अक्षत दूभि छीटि सभगेला,
अपन अपन गृह बहुसुख पाए।
समुचित सभक विदाइ भेल छल,
छला जेहन जे अति हरषाए।
अतिरिक्तोमे बहुत भेल छल,
रत्नादिक वस्त्रादिक दान।
भेला अयााचक सभ याचकगण,
कयल गल सबहक सम्मानं
समारोह हरषक छल नमरल,
दिवस पक्ष नहि मासक मास।
उदधि हर्ष केर उमड़ल ततवा,
बिनु सीमा जनु हो आकाश।
बहुतो गायक वादक नर्तक,
कयल प्रदर्शित कला विशिष्टं
दिग दिगंत मधुए मधु बरसए,
सभक भेल छल पूर्ण अभीष्ट।
एहि सुखद अतिसँ आनन्दक,
बीति गेल छल दिन छल मास।
बजा सखा सभकें प्रभु कहलनि,
जाइ जाउ सभ अपन निवास।
छला सखा सुग्रीव विभीषण,
द्विविद नील नल अरू हनुमंत।
सुनि तहि बजला करूण बोलमे,
जामवंत अंगद बलबंत।
नहि होइछ मन कतुहु प्रभूकेर,
जाई चरण अम्बुजकें छोड़ि।
लपिटि री एहीमे सदिखन,
आन जगतसँ बंधन तोड़ि।
किन्तु राम बहुविधि समझौलनि,
बनल रहत सदिखन ममनेह।
स्मरण करब जखनहि जहिपलमे,
भेटब तखनहि बिनु संदेह।
बिसरि सकैछी नहि जीवनमे,
जे कयलहुँ अछि मम उपकारं
जीवन अपन लगा कऽ कयलहुँ,
हमर संग दए यग उद्धार।
सभ क्यो मानि गेला रामक वच,
किन्तु ने सुनलनि श्रीहनुमान।
रहब अखन प्रभुचरण कमलमे,
सेवा करब लगा मनप्राण।
भेल विदाइ सभक हुनमत तजि,
सौम्य वस्त्र रत्नादिक संग।
शोभा अतिसुरम्य छल तखनक,
नभक इन्द्र धनु जनु बहुरंग।
चलल छल रामक राज्य अबाध,
प्रजा नृपमे छल प्रीति अगाध।
कतहुनहि छल ईर्ष्याकेर नाम,
द्वेष केर सेहो कतहु ने ठाम।
प्रजाछल सभ तरहें सम्पन्न,
कतहु नहि क्यो छल कनओं बिपन्न।
धरए नहि ककरो असमय काल,
रहै छल भागल व्याधिक व्याल।
दैत छल सबहक सभक्यो संग।
करै छल नहि ककरो क्यो व्यंग।
समय पर मेघहु दैछल पानिं
धरणि केर उपजामे नहि हानि।
वैश्य जन करथि शुद्ध व्यापार।
बनौने छला नेलाभ अधार।
छलै नहि चोरि चमारिक नाम,
सुतै छल सभ निचिंत अविराम।
फूसि केर तकहु ने छल व्यापार,
छलै सबहक सत्ते आधार।
न्याय छल सबहक संग समान,
विषमता केर नहि कतहु प्रमाण।
तरू सभ दैछल बहु फल फूल,
खनहु नहि प्रकृति रहए प्रतिकूल।
करैछल पालन सभ निज धर्म,
तकर हित करै छला शुभकर्म।
सतत् यज्ञादि हवन केर कार्य,
ब्राह्मणक हेतु छलनि अनिवार्य।
वरणन हो कतवा एकर, कतबा हो वृतान्त।
युग युग धरि बनले रहत, राम राज्य दृष्टान्त।
छा एकदिन बैसल गृहमे,
सिया संग रघुवर एकांत।
जिज्ञासा सियसँ प्रभु कयलनि।
</poem>
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