भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

Changes

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

नाता-रिश्ता / अज्ञेय

17 bytes added, 09:31, 31 मार्च 2008
तुम सतत <br>
चिरन्तन छिने जाते हुए <br>
क्षण का सुख हो-- हो— <br>
(इसी में उस सुख की अलौकिकता है): <br>
भाषा की पकड़ में से फिसली जाती हुई <br>
:::भावना का अर्थ-- अर्थ— <br>
(वही तो अर्थ सनातन है): <br>
वह सोने की कली जो उस अंजलि-भर रेत में थी जो <br>
::::धो कर अलग करने में-- में— <br>::मुट्ठियों से फिसल कर नदी में बह गई-- गई— <br>
(उसी अकाल, अकूल नदी में जिस में से फिर <br>
:::::अंजलि भरेगी <br>
और फिर सोने की कनी फिसल कर बह जाएगी।) <br> <br>
 
तुम सदा से <br>
वह गान हो जिस की टेक-भर <br>
::हवा के झोंकों के लिए रह गया <br>
पर दीवारें सब बेमौसम की वर्षा में बह गईं... <br>
यही सब हमारा नाता रिश्ता है--इसी है—इसी में मैं हूँ <br>
::::और तुम हो: <br>
और इतनी ही बात है जो बार-बार कही गई <br>
और हर बार कही जाने में ही कही जाने से रह गई। <br> <br> <br>
 
::२ <br> <br>
तो यों, इस लिए <br>
केवल मरु का रेत-लदा झोंका <br>
डँसता है और फिर एक किरकिरी <br>
हँसी हँसता बढ़ जाता है-- है— <br>
यहीं <br>
जहाँ रवि तपता है <br>
और अपनी ही तपन से जनी धूल-कनी की <br>
यवनिका में झपता है-- है— <br>
यहीं <br>
जहाँ सब कुछ दीखता है, <br>
जहाँ सब कुछ साँय-साँय गूंजता है <br>
और निरे शोर में संयत स्वर धोखे से <br>
:लड़खड़ा कर झड़ जाता है। <br> <br> <br> 
::३ <br> <br>
यहीं, यहीं और अभी <br>
इस सधे सन्धि-क्षण में <br>
इस नए जनमे, नए जागे, <br>
अपूर्व, अद्वितीय--अभागे अद्वितीय—अभागे <br>
मेरे पुण्यगीत को <br>
अपने अन्तःशून्य में ही तन्मय हो जाने दो-- दो— <br>
यों अपने को पाने दो! <br> <br> <br>
 
::४ <br> <br>
वही, वैसे ही अपने को पा ले, नहीं तो <br>
और मैंने कब, कहाँ तुम्हें पाया है? <br>
हाँ--बातों हाँ—बातों के बीच की चुप्पियों में <br>
हँसी में उलझ कर अनसुनी हो गई आहों में <br>
भीड़ों में भटकी हुई अनाथ आँखों में <br>
बरसों पहले गुज़रे हुए यात्रियों की <br>
दाल-बाटी की बची-बुझी राखों में! <br> <br> <br>
 
::५ <br> <br>
उस राख का पाथेय लेकर मैं चलता हूँ-- हूँ— <br>
उस मौन की भाषा मैं गाता हूँ: <br>
उस अलक्षित, अपरिमेय निमिष में <br>
::मैं तुम्हारे पास जाता हूँ, पर <br>मैं, जो होने में ही अपने को छलता हूँ-- हूँ— <br>
यों अपने अनस्तित्व में तुम्हें पाता हूँ! <br>
Anonymous user