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|संग्रह=करूणा भरल ई गीत हम्मर / धीरेन्द्र
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<poem>
ने टोकू ई सपना जँ हम देखै छी
अपना जेकाँ मात्र इएहटा बुझाएल !
सत्ते कहै छी भुजबी ई छाती
हमर प्राण अछि ई पूरक घायल।
ठकलक बहुतराश साँचे कि लोको
एखनहुँ ठकै अछि, ठकब धर्म ओकरं
हमरा जँ ठकि कए सुखी अछि ई तगती
हमरा वेदना यदि खुशी दए सकै अछि,
सहब इष्ट सभटा जते दुःख आबओ,
गड़ओ काँट पूरा, करओ बिद्ध हमरा।
फूलक अराधन करए लोक आरो,
शूलक ई पूजा हमर बस नियति अछि।
बहओ नोर बोधक किरण थोड़ नहि अछि,
हमर प्राप्य एतबए रहल एहि जगमे।
</poem>
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