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|संग्रह=करूणा भरल ई गीत हम्मर / धीरेन्द्र
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<poem>
ज्योतिक आराधक बदनाम पूरा,
अन्हारक ने सपना कहियो देखल हम।
साँचोमे आँचे यछि अछि बुझाइत,
सहन सभ करब हम उत्ताप आगिक।
मुदा ने मिझाबी ई ज्योतिक शिखाकें
अनावृत सत्यकेर हम रहलहुँ उपासकं
पाकी वा झरकी वा खाके बनी हम,
आस्था हमर बस रहओ संग हमर।
रहऽ बस दियऽ ई उपदेश सभटा
ढाहू ई ढिमका जमल अछि जे रूढ़िक।
निर्बन्ध होअओ ग्रन्थिकेर ई जे बन्धन
बनओ मुक्त मानस पवनवत बनओ ई।
चलू जा मरी संग, यदिउएह अछि अपेक्षित,
देखओ ई दुनियाँ, ने असगर छलहुँ हम।
</poem>
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