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|संग्रह=करूणा भरल ई गीत हम्मर / धीरेन्द्र
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<poem>
रोकऽ ! ने तीतय पलकपट हे मीता !
गीता जे पढ़लह, गुनह आइ से तों !!
रोपी जे गाछो, छीटी जे बीया,
फलक श्रेय सभटा करी जन-समर्पित।
रोपब वा छीटब स्वभावक छी अंशे,
गाछक बढ़ब मात्र बनय प्रेय कर्मीक।
गड़य काँट बुझि ली मालिक नियति ई
फूलक गमक व चमक वस्तु अनकर।
बिसरह आ गबइत बढ़ह आ आगू
रोपह आ छीटह करह बस सृजन तों
स्त्रष्टा वा द्रष्टा ने भोक्ता रहल अछि,
सिरजब निरन्तर ओकर प्रेय होइछ।
रोकऽ जँ उमड़य चोटायल मनक सर,
एना तों करह नोर शब्दे बनय बस,
सुनय मात्र दुनियाँ वेणुक निनादे।
</poem>
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