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शरीर जड़कवि ‘हीरा’ केॅपढ़ै आरो आत्मा चेतनगढ़ै केबुझैं रे मन सुप्रवृति छै
शब्द, स्पर्श सेंकवि ‘हरेन्द्र’रूप, रस, गंध सेंबहुजन हितायरहित ईश । नित्य अजन्माअनादि-अनंत छैपरमेश्वर । सब्भे प्राणी केअन्दर निवास छैईश्वर के । परमेश्वरउत्पत्ति-विनाशो ॅ सेंरहित छै । परमेश्वरसब्भै के नियंता छैसब्भें कहै छै । आत्मचिंतनसंभव नै हुऐ छैज्ञान के बिना ।परम धामवहेॅ छेकै, जैठाँ सेंजीव नै लौटै । आत्मचिन्तनसम्भव नै हुऐ छैज्ञान के बिना । पुण्य-क्षीण सेंमनुष्य मृत्युलोकभ्रमण करेॅ । अपना परजेकरा विश्वास नैईश पर नै । नर-तन तेॅखुदा-महल छेकै‘नानक’ बोलै । मधुमक्खी तेॅफूलोॅ सें पराग लैमधु बनावै । वृक्ष आपनोॅकाटै वाला केॅ भीछायाए दै छै श्रेणी में आवै
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