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गुनाह का गीत / धर्मवीर भारती

322 bytes added, 15:22, 14 फ़रवरी 2018
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बरबाद मेरी ज़िन्दगी अगर मैंने किसी के होठ के पाटल कभी चूमेइन फिरोज़ी होठों अगर मैंने किसी के नैन के बादल कभी चूमेमहज इससे किसी का प्यार मुझको पाप कैसे हो?महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ परशाप कैसे हो?
तुम्हारा मन अगर सींचूँगुलाबी पाँखुरी तन अगर सींचूँ तरल मलयज झकोरों से!तुम्हारा चित्र खींचूँ प्यास के रंगीन डोरों सेकली-सा तन, किरन-सा मन, शिथिल सतरंगिया आँचलउसी में खिल पड़ें यदि भूल से कुछ होठ के पाटलकिसी के होठ पर हल्की सुरमई आभा झुक जाएँ कच्चे नैन के बादलकि ज्यों करवट बदल लेती कभी बरसात की दुपहर महज इससे किसी का प्यार मुझ पर पाप कैसे हो?इन फिरोज़ी होठों महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ परशाप कैसे हो?
तुम्हारे स्पर्श किसी की बादल-धुली कचनार नरमाई गोद में सिर धरघटा घनघोर बिखराकर, अगर विश्वास हो जाएतुम्हारे धड़कते वक्ष की जादू भरी मदहोश गरमाई पर मेरा अगर अस्तित्व खो जाए?तुम्हारी चितवनों में नर्गिसों न हो यह वासना तो ज़िन्दगी की पाँत शरमाई माप कैसे हो?किसी की मोल पर मैं आज अपने को लुटा सकता सिखाने को कहा मुझसे प्रणय के देवताओं ने तुम्हें आदिम गुनाहों रूप का अजब-सा इन्द्रधनुषी स्वाद सम्मान मुझ पर पाप कैसे हो?मेरी ज़िन्दगी बरबाद !नसों का रेशमी तूफ़ान मुझ पर शाप कैसे हो?
अन्धेरी रात में खिलते हुए बेले-सरीखा मनकिसी की साँस मैं चुन दूँमृणालों किसी के होठ पर बुन दूँ अगर अँगूर की मुलायम बाँह ने सीखी नहीं उलझन पर्तेंसुहागन लाज प्रणय में लिपटा शरद निभ नहीं पातीं कभी इस तौर की धूप जैसा तन शर्तेंपँखुरियों यहाँ तो हर क़दम पर भँवर-सा मन टूटता जाता स्वर्ग की पगडण्डियाँ घूमींमुझे तो वासना का अगर मैंने किसी की मदभरी अँगड़ाइयाँ चूमींविष हमेशा बन गया अमृत अगर मैंने किसी की साँस की पुरवाइयाँ चूमींबशर्ते वासना भी महज इससे किसी का प्यार मुझ पर पाप कैसे हो तुम्हारे रूप से आबाद ?मेरी ज़िन्दगी बरबाद !महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो?
गुनाहों '''कविता-संग्रह ’ठण्डा लोहा' से कभी मैली पड़ी बेदाग तरुणाई — सितारों की जलन से बादलों पर आँच कब आई न चन्दा को कभी व्यापी अमा की घोस कजराई बड़ा मासूम होता है गुनाहों का समर्पण भी हमेशा आदमी मजबूर होकर लौट आता है जहाँ हर मुक्ति के, हर त्याग के, हर साधना के बाद मेरी ज़िन्दगी बरबाद !'''
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