एक पैकेट दूध का जुगाड़
फिर मैंने पढ़ा वर्गीज़ कूरियन की बाबत
कैसे उन्होंने अतीत की दूध-दही की कहावती नदियों के बरक्सबरअक्स
दूध-दही की वास्तविक नदी निकाली गुजरात के आणन्द में
बड़े से छोटे किसानों और खेतिहर मज़दूरों तक से बूँद-बूँद दूध इकठ्ठा करते हुए
और उनके देसी गुर्गों और उनके सरकारी आकाओं को
क्योंकि वे अपने आणन्द को उनके साये से मुक्त रखते थे
सरकारी होने के बावजूद ख़ुद को सरकारी नहीं 'गरीब ग़रीब किसानों का नौकर' कहते थे
और अपने जीवन काल में ही दन्तकथा बन गए थे
पुरमज़ाक कूरियन को भी मज़ा आता था
नई से नई पूँजी के गुलाम ग़ुलाम नौकरशाहों नेताओं को चिढ़ाने में
कहते हैं एक आला प्रबन्धन संस्थान के मुखिया ने उनसे कहा,
'तो मिस्टर कूरियन, आप हमारे छात्रों को गाँवों में भेजकर उनसे भैंस दुहाना चाहेंगे?'
और दूध हो या ग्रामीण प्रबन्धन
उसके कर्ता-धर्ता ख़ुद को मानते थे इन्हीं साधारण मनुष्यों के सेवक
इसीलिए श्याम बेनेगल की फिल्म फ़िल्म 'मंथन' बन सकी
जिसके निर्माता लाखों दूधवाले किसान थे
जिन्होंने दो रुपये प्रति किसान देकर जुटाए फिल्म फ़िल्म के लिए दस लाख
कूरियन की यह जीवन दृष्टि आला प्रबन्धन के नौकरशाहों को नहीं आई रास
सियासतदानों को भी उन्होंने कर दिया था नाराज़
या किसी ग़रीब बच्चे के हाथ में एक कटोरे में ज़रा-सा दूध
तो तुम्हारा नाम याद आता है
वह कुचक्र याद आता है जिसने तुम्हें अमूल छोडऩे छोड़ने को विवश किया
और जब मैं एक चम्मच भर गाढ़ा दही मुँह में ले जाने को होता हूँ
तो सहसा एक उदासी घेर लेती है
और मैं अपनी आँखों में उमड़ते पानी को रोकने की कोशिश करता हूँ।
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