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|रचनाकार = सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"|अनुवादक=|संग्रह=
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<poem>अंचल के चंचल क्षुद्र प्रपात !<br>मचलते हुए निकल आते हो;<br>उज्जवल! घन-वन-अंधकार के साथ<br>खेलते हो क्यों? क्या पाते हो ?<br> अंधकार पर इतना प्यार,<br>क्या जाने यह बालक का अविचार<br>बुद्ध का या कि साम्य-व्यवहार !<br>तुम्हारा करता है गतिरोध<br>पिता का कोई दूत अबोध-<br>किसी पत्थर से टकराते हो<br>फिरकर ज़रा ठहर जाते हो;<br> उसे जब लेते हो पहचान-<br>समझ जाते हो उस जड़ का सारा अज्ञान,<br>फूट पड़ती है ओंठों पर तब मृदु मुस्कान;<br>बस अजान की ओर इशारा करके चल देते हो,<br>
भर जाते हो उसके अन्तर में तुम अपनी तान ।
</poem>