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{{KKRachna
|रचनाकार=जहीर कुरैशी
|अनुवादक=
|संग्रह=भीड़ में सबसे अलग / जहीर कुरैशी
}}
डबडबाए नयन का पता चल गया
बदलियों से गगन का पता चल गया
लाख कोई छिपाने की कोशिश करे
हाव—भावों से मन का पता चल गया
एक मीठी नदी ज्यों ही खारी हुई
उसको अपने ‘चयन’ का पता चल गया
अवसरों के निकष से गुज़रते हुए
खुद—ब—खुद मन—वचन का पता चल गया
वो ही रस्सी पे दौड़ेगा नट की तरह
जिसको निज संतुलन का पता चल गया
उम्र के मोड़ पर साठ के बाद में
सबको अपनी थकन का पता चल गया
अपने शे’रों से दुनिया बदलते हुए
शायरी के मिशन का पता चल गया !
</poem>