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/* मुखोटा */
धधकती आग
 
उत्कट, , विकट आवाज
 
दहाड़ चेतनतत्तव की
 
अठ्हास किया
 
लंकापति ने
 
विस्मय मन से
 
देखा जब
 
दंभ, दर्प, मद कोप भरे
 
मुखोटे के पीछे
 
छुपे कलयुगी राम को
 
दहाड़ा दशानन
 
फिर कोई विभिषण
 
भेद किये जा रहा है
 
क्यूँ जन मानस से साथ
 
जो छुपा मन के
 
छल कपट
 
अंहकार अपने
 
चला है अचला से
 
तिमिर मिटाने को
 
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रचना: महावीर जोशी पुलासर (सरदारशहर) राजस्थान