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<poem>
काबे से रंज है न अदावत कुनिश्त से,
दिल ये बहल न पायेगा अपना बहिश्त से।

इस आरज़ू में एक ही पल को सुकूँ मिले,
हम दिल बदल रहे हैं तेरे संग ओ ख़िश्त से।

इक तुम ही थे न जिसको कभी रास आ सकी,
दुनिया ये चल रही है मेरी सरगुज़िश्त से।

राह ए वफ़ा में अब क्या लुटाओगे सोच लो,
दाख़िल तो हो गए हो दिल ओ जाँ की किश्त से।

जिससे अज़ाब ए इश्क़ की ताक़त में हो कमी,
मुंह हम नहीं लगाते कभी उस पलिश्त से।

दिल है के रक़्स करता है ज़ंजीर बांध कर,
लग कर कहीं न बैठा हो ये अहल ए चिश्त से।

हर गोशा है सुकून के आब ए बक़ा से तर,
बाहर निकल के देख ज़रा ख़ूब ओ ज़िश्त से।

बढ़कर जुनूँ ने कर ही दिया आसमां बुलंद,
तालीम ले रहा था वो मेरी सरिश्त से।

ठहरो नदीम सांस तो लेने दो ज़ोफ़ में,
घबरा रहा है इश्क़ मेरे सरनविश्त से।</poem>
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