भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

Changes

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

यादों की चील / मधु शुक्ला

1,982 bytes added, 20:34, 29 जनवरी 2024
'{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=मधु शुक्ला |अनुवादक= |संग्रह= }} {{KKCatKav...' के साथ नया पृष्ठ बनाया
{{KKGlobal}}
{{KKRachna
|रचनाकार=मधु शुक्ला
|अनुवादक=
|संग्रह=
}}
{{KKCatKavita}}
<poem>
लम्हा- लम्हा गुज़रता रहा वक़्त
बनाता हुआ फ़ासले
हमारे दरमियाँ
और हम देखते रहे
बने हुए बुत
उम्मीदों को टूटते
आशाओं को छूटते
तार- तार होते भावनाओं को, आहत होते
उधेड़ते हुए आस्थाओं को परत-दर-परत ।

ख़ामोशी के साये में
धुँधलाते रहे चाहत के दीये
खिंचते गए हमारे बीच अहम के हाशिये
बदल गईं प्रेम की परिभाषाएँ, रिश्तों के अर्थ
मौन से बँधी रहीं मेरी विवशताएँ और तुम्हारा दर्प
तुम्हारी शर्तों के दायरे में सिमटते - सिमटते
ठूँठ हो गए हैं सपनों के दरख़्त ।

अब नहीं भरते उड़ान इस ओर
कल्पनाओं के रंग - बिरंगे पंछी
नहीं फुदकती इन शाखाओं में
उमंगों की चंचल गिलहरियाँ
पीठ पर लिए उँगलियों के निशान
दिख जाती बैठी, बस,
यादों की चील
घूरती हुई
घुप्प सन्नाटों में
कभी - कभी यों ही वक़्त - बेवक़्त ।
लम्हा- लम्हा गुज़रता रहा वक़्त ।

</poem>
Delete, Mover, Protect, Reupload, Uploader
54,035
edits