भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
Changes
Kavita Kosh से
'{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=रसूल हम्ज़ातव |अनुवादक=मदनलाल मध...' के साथ नया पृष्ठ बनाया
{{KKGlobal}}
{{KKRachna
|रचनाकार=रसूल हम्ज़ातव
|अनुवादक=मदनलाल मधु
|संग्रह=
}}
{{KKCatKavita}}
कभी-कभी लगता है मुझको वे सैनिक
रक्तिम युद्ध-भूमि सेलौट न जो आए,
नहीं मरे वे वहाँ, बने मानो सारस
उड़े गगन में, श्वेत पंख सब फैलाए ।
उन्हीं दिनों से, बीते हुए ज़माने से
उड़े गगन में, गूँजें उनकी आवाज़ें
क्या न इसी कारण ही अक्सर चुप रहकर
भारी मन से हम नीले नभ को ताकें ।
आज, शाम के घिरते हुए अन्धेरे में
देखूँ, धुन्ध-कुहासे में सारस उड़ते,
अपना दल-सा एक बनाए उसी तरह
जैसे जब थे मानव, भू पर डग भरते ।
वे उड़ते हैं, लम्बी मंज़िल तय करते
और पुकारें जैसे नाम किसी के वे,
शायद इनकी ही पुकार से इसीलिए
शब्द हमारी भाषा के मिलते-जुलते ?
उड़ते जाते हैं सारस-दल थके-थके
धुन्ध-कुहासे में भी, जब दिन ढलता है,
उस तिकोण में उनके ज़रा जगह ख़ाली
वह तो मेरे लिए,
<poem>
</poem>
{{KKRachna
|रचनाकार=रसूल हम्ज़ातव
|अनुवादक=मदनलाल मधु
|संग्रह=
}}
{{KKCatKavita}}
कभी-कभी लगता है मुझको वे सैनिक
रक्तिम युद्ध-भूमि सेलौट न जो आए,
नहीं मरे वे वहाँ, बने मानो सारस
उड़े गगन में, श्वेत पंख सब फैलाए ।
उन्हीं दिनों से, बीते हुए ज़माने से
उड़े गगन में, गूँजें उनकी आवाज़ें
क्या न इसी कारण ही अक्सर चुप रहकर
भारी मन से हम नीले नभ को ताकें ।
आज, शाम के घिरते हुए अन्धेरे में
देखूँ, धुन्ध-कुहासे में सारस उड़ते,
अपना दल-सा एक बनाए उसी तरह
जैसे जब थे मानव, भू पर डग भरते ।
वे उड़ते हैं, लम्बी मंज़िल तय करते
और पुकारें जैसे नाम किसी के वे,
शायद इनकी ही पुकार से इसीलिए
शब्द हमारी भाषा के मिलते-जुलते ?
उड़ते जाते हैं सारस-दल थके-थके
धुन्ध-कुहासे में भी, जब दिन ढलता है,
उस तिकोण में उनके ज़रा जगह ख़ाली
वह तो मेरे लिए,
<poem>
</poem>