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सारस / रसूल हम्ज़ातव

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|रचनाकार=रसूल हम्ज़ातव
|अनुवादक=मदनलाल मधु
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कभी-कभी लगता है मुझको वे सैनिक
रक्तिम युद्ध-भूमि सेलौट न जो आए,
नहीं मरे वे वहाँ, बने मानो सारस
उड़े गगन में, श्वेत पंख सब फैलाए ।

उन्हीं दिनों से, बीते हुए ज़माने से
उड़े गगन में, गूँजें उनकी आवाज़ें
क्या न इसी कारण ही अक्सर चुप रहकर
भारी मन से हम नीले नभ को ताकें ।

आज, शाम के घिरते हुए अन्धेरे में
देखूँ, धुन्ध-कुहासे में सारस उड़ते,
अपना दल-सा एक बनाए उसी तरह
जैसे जब थे मानव, भू पर डग भरते ।

वे उड़ते हैं, लम्बी मंज़िल तय करते
और पुकारें जैसे नाम किसी के वे,
शायद इनकी ही पुकार से इसीलिए
शब्द हमारी भाषा के मिलते-जुलते ?

उड़ते जाते हैं सारस-दल थके-थके
धुन्ध-कुहासे में भी, जब दिन ढलता है,
उस तिकोण में उनके ज़रा जगह ख़ाली
वह तो मेरे लिए,



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