भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
Changes
Kavita Kosh से
<poem>
तू है बेशक परी जमालों में
नींद क्योंकर ख़फ़ा है आँखों सेहै ख़फ़ा मेरी
अब तो आती है बस ख़यालों में
हर कोई जाएगा यहाँ से 'रक़ीब'
हम भी हैं याँ से जाने वालों में
</poem>