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Kavita Kosh से
बनो तो मुफ़लिसो-नादार के बनो मेहमाँ
वो मेहजबान मेजबान बड़े ग़मगुसार ग़म गुसार होते हैं
ये तेरी ज़ुल्फ़ बिखरती है जब तेरे रुख़ पर
'रक़ीब' होते हैं वो लोग पैकरे-उल्फ़त
के जिनके दामने-दिल तार-तार होते हैं
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