गृह
बेतरतीब
ध्यानसूची
सेटिंग्स
लॉग इन करें
कविता कोश के बारे में
अस्वीकरण
Changes
जब भी तू मेहरबान होता है / सतीश शुक्ला 'रक़ीब'
No change in size
,
5 फ़रवरी
{{KKCatGhazal}}
<poem>
जब भी
तू मेहरबान होता है
दिल मेरा बदगुमान होता है
जीत लेता है दुश्मनों के दिल
जो
जब
कोई
ख़ुशबयान
ख़ुश बयान
होता है
रोज ख़तरों से खेलने वाला
हो जो शाइर हक़ीक़तन ऐ 'रक़ीब'
वो ही अहले ज़बान होता है
</poem>
SATISH SHUKLA
488
edits