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11 मार्च {{KKGlobal}}
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|रचनाकार=अरुण आदित्य
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<poem>
तुम्हारी दुनिया में
कैसे समा सकता है मेरा गाँव ?
इतनी छोटी है तुम्हारी दुनिया
कि इसमें है सिर्फ़ स्वार्थ-भर जगह
और स्वप्न-भर विस्तार में बसा हुआ है मेरा गाँव
प्रेम-भर मेरी गठरी ही
नहीं समा पा रही इस स्वार्थ-भर जगह में
फिर स्वाभिमान-भर ऊँची ये लाठी कहाँ खड़ी करूँ ?
लाठी और गठरी के बिना
बेशक समा सकता हूँ मैं तुम्हारी दुनिया में
लेकिन कैसे छोड़ दूँ
इन दोनों में से एक भी चीज़
कि ये लाठी और गठरी ही मेरी दुनिया है
तुमको मुबारक हो तुम्हारी दुनिया
मुझे पड़ा रहने दो अपनी लाठी और गठरी के साथ ।
</poem>
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