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ज़ुकाम / अरुण आदित्य

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छींक पर छींक आ रही है लगातार
सिर भारी, आँखें बोझिल
और नाक का हाल तो पूछना ही बेकार

गला बैठा है और तबीयत पस्त
हाथ, पाँव, पीठ, छाती हर अंग में जकड़न है
पर यह सब महज विवरण है

और ज़ुकाम के लाइव अनुभव के बीच इसे लिखते हुए
बहुत अच्छी तरह महसूस कर रहा हूँ मैं
कि किसी भी विवरण में
नहीं समा सकती है वास्तविक तकलीफ़

जब ज़ुकाम जैसी सामान्य तकलीफ़ तक
नहीं अँट सकती किसी कविता में
तो कैसे कह दूँ कि दुनिया भर के दर्द का
दस्तावेज़ है मेरी कविता ।
</poem>
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