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<poem>
निकालो बाहर मेरे लहू से मेरी ख़ामोशियाँ
मेरी हैरत, मेरी सरगोशियाँ
निकालो ! निकालो ! उस क़दीमी मायूसी को
जो निकलती नहीं किसी करवट
उस मामूलीपन को भी निकालो
जो याद आता है छुटपन की तरह

निकालो ! निकालो !
मेरे लहू से मेरे खोए हुए असरार
निकालो मेरे लहू से मेरा बिलखना,
मेरी पुकार
निकालो मेरी ठण्डी रूह को
उस हौलनाक अन्धेरे से
जहाँ वो कब से पड़ी है साकित

निकालो ! निकालो !
मुझसे मेरी उलझनें,
मेरी नाचारी
मेरे लहू में उतारो अपने खंजर
अपने तिरशूल
अपनी तलवारें
अपनी पिस्तौल

निकालो ! निकालो !
मेरे लहू से शरारे निकालो
मेरे लहू से शहर के शहर
सहरा के सहरा
दश्त के दश्त
निकालो मेरे लहू से मेरी बेचैनियाँ,
मेरी तड़प

निकालो मेरे लहू से अपने आहन
अपना सोना
अपने शीशे
अपने जहाज़
अपना फ़रेब, अपना झूठ
निकालो बाहर मुझसे अपनी तस्वीरें
निकालो ! निकालो !
मेरे लहू में तैरती अपनी गड़ती आँखें

निकालो बाहर मुझसे जानवरों के रेवड़
मुझसे बाहर निकालो मेरी उदास शामें,
मेरी रातों के रतजगे
मेरी सुब्ह की चटख
मेरी बरहनगी
मेरे शोले, मेरे बुत, मेरी रौशनाई
निकालो बाहर मेरे लहू से बेशुमार सनमकदे,
मनादिर और कलश और कँवल और राख

मेरे लहू से निकालो अपने ख़ुदाओं को
ख़ुदा के लिए एक-एक कर अब…
</poem>
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