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Kavita Kosh से
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वह जब थी
तो कुछ इस तरह थी
जैसे कोई भी बीमार बुढ़ीया बुढ़िया होती है
शहर के किसी भी घर में
अपने दिन गिनती।
वह जब थी
उस शहर और घर को
कोई खबर ख़बर न थी
कि दर्द और संघर्ष की
अपनी दुनिया में
वह किस कदर अकेली थी ।
कहां शामिल था
आज जब वह जा रही है
तो रोता है घर
स्तब्ध ह्ऐ ह्आ शहर
खड़ा हो गया है कोई दोनो हाथ जोड़े
दुकान में सरक गया है कोई मुह मुँह फेर कर
भीड़ ने रास्ता दे दिया है उसे
ट्रैफिक थम गया है
चौराहे पर
वर्दीधारी उस सिपाही ने भी
अदब से ठोक दिया है सलाम।
आज जब जा रही है मांमाँ
तो लगने लगा है सहसा
मुझे
इस घर को
और पूरे शहर को
कि वह थी...........और अब नहीं रही।
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