भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

Changes

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

आज जब वह जा रही है / अजेय

175 bytes removed, 21:36, 4 दिसम्बर 2008
<poem>
आज जब वह जा रही है'''(मां माँ की अंतिम यात्रा से लौटने पर)
वह जब थी
तो कुछ इस तरह थी
जैसे कोई भी बीमार बुढ़ीया बुढ़िया होती है
शहर के किसी भी घर में
अपने दिन गिनती।
वह जब थी
उस शहर और घर को
कोई खबर ख़बर न थी
कि दर्द और संघर्ष की
अपनी दुनिया में
वह किस कदर अकेली थी ।
 
आज जब वह जा रही है।
(मां की अंतिम यात्रा से लौटने पर)
 
कहां शामिल था
आज जब वह जा रही है
तो रोता है घर
स्तब्ध ह्ऐ ह्आ शहर
खड़ा हो गया है कोई दोनो हाथ जोड़े
दुकान में सरक गया है कोई मुह मुँह फेर कर
भीड़ ने रास्ता दे दिया है उसे
ट्रैफिक थम गया है
गाड़ियां गाड़ियाँ भारी -भरकम अपनी गर्वीली गुर्राहट बंद करएक तरफ हो गई है हैं दो पल के लिए
चौराहे पर
वर्दीधारी उस सिपाही ने भी
अदब से ठोक दिया है सलाम।
आज जब जा रही है मांमाँ
तो लगने लगा है सहसा
मुझे
इस घर को
और पूरे शहर को
कि वह थी...........और अब नहीं रही।
</poem>
Delete, Mover, Protect, Reupload, Uploader
54,039
edits