भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
Changes
Kavita Kosh से
अकसर तुझको देखा है कि ताना बुनते
जब कोइ कोई तागा टुट टूट गया या खत्म हुआ
फिर से बांध के
तेरे इस ताने में लेकिन
इक भी गांठ गिराह गिरह बुन्तर की
देख नहीं सकता कोई
Anonymous user