होंठो पर सिसकती..
थिरकती ,मचलती
नदी -सी मुझे लगती है
और तब नयनों से जैसे
कोई बदरी बिन बरखा के बरसती है
और फ़िर यूं फिर यूँ ही कुछ उभरे हुए
अखारों की जुबान
पूछती है एक सवाल
नही नहीं जानती किस से?
क्या मिलेगा कभी कोई जवाब मुझे
अपने ही भीतर दहकते इस लावे का
बस जानती हूँ कि
एक जमीन ज़मीन ...एक आसमानबसते है हैं इस माटी के पुतले में भी
और मोहब्बत का जहान
एक जाल कभी बुनता है
जिसका दीदार
सिर्फ़ इस कायनात के पार होता है ..
और यह सफर यूं यूँ ही अधूरा रहता है....
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