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Kavita Kosh से
यह मैंने जाना
तुम्हारे जाने के बाद
तुम जहां नहीं होती
वहां छांह नहीं होती
कोई आसरा नहीं होता
हर आहट हो जाती है दूर
प्रेम की तड़प खत्म नहीं हुई हमारी
इस उत्तर आधुनिक युग में भी
तुम्हारी पलकें झुकेंगी
और छुपा लेंगी मुझे अंदर कहीं
बिखरे केश में ढंक जाता है तुम्हारा चेहरा
चांद और बादल का ऐसा
एक तुम्ही रच सकती हो
एस धरती पर
मुझे पता है
मैं खत्म हो जाऊंगा एक दिन
तब भी नहीं देख पाऊंगा यह सच।
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