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{{KKGlobal}}{{KKRachna|रचनाकार: [[=तेजेन्द्र शर्मा]][[Category:कविताएँ]]}}[[Category:तेजेन्द्र शर्मा]]<poem>नज़र जो तुमने फेर ली, नहीं है कोई गिलामेरी वफ़ाओं का अच्छा दिया है तुमने सिला
~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~तुम्हें समझ सकूँ, ये बस में नहीं था मेरेमेरी नज़र का वो पैगाम, कहां तुमको मिला
नज़र है तुमने गै़र की आंखों में बसेरा जो तुमने फेर ली, नहीं है कोई गिला<br>कियामेरी वफ़ाओं का अच्छा दिया ये दिल है तुमने सिला<br><br>टूट गया और मेरा वजूद हिला
तुम्हें समझ सकूँन तुम से कोई थी उम्मीद, ये बस में नहीं था मेरे<br>न शिकायत हीमेरी नज़र का वो पैगामन सही जाम, कहां तुमको मिला<br><br>मुझको एक घूंट ज़हर पिला
है तुमने गै़र की आंखों में बसेरा जो किया<br>ये दिल है टूट गया और मेरा वजूद हिला<br><br> न तुम से कोई थी उम्मीद, न शिकायत ही<br>न सही जाम, मुझको एक घूंट ज़हर पिला<br><br> तेरे सितम से मेरी आंख क्यों न होगी नम<br>मैं भी इन्सान हूँ, पत्थर की नहीं कोई शिला<br><br/poem>
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