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गुरु की कच्ची नींद तोड़ने का, पर पाप नहीं लूँगा।
परशुराम जग पड़े, रक्त को देख हुए विस्मित मन में।
सहता रहा अचल, जाने कब से, ऐसी वेदना कड़ी।'
क्षण भर को विश्राम मिला जो नाहक उसे गँवायेंगे।
लज्जित हूँ इसीलिए कि सब-कुछ स्वयं आपने देख लिया।'
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