भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

Changes

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

कुछ व्यथित-सी / विष्णु विराट

37 bytes added, 18:36, 12 सितम्बर 2006
कुछ व्यथित-सी
 
कुछ थकित-सी
 
कुछ चकित-सी
 
धूम्रवन से लौट आई लाल परियां
 
चक्रवाती जंगलों की आंधियों से
 
वामतंत्री कुचक्रों की व्याधियों से
 
व्याघ्रवन में सर-सरोवर ख़ौफ़ खाए
 
कांपते-से हिरन के दल थरथराए
 
हार कर सब दाव
 
सारे स्वप्न अपने
 
कुछ भ्रमित-सी
 
कुछ श्रमित-सी
 
प्रकंपित-सी
 
उस विजन तक जा न पाई
 
लाल परियां
 
राग से और रंग से मुंह मोड़ती-सी
 
स्वर्ण कमलों के प्रलोभन
 
छोड़ती-सी
 
नदी झरने जादुई चक्कर घनेरे
 
हर लहर में मगरच्छों के बसेरे
 
श्लथ हुए कटिबंध
 
भींगी कंचुकी में
 
कुछ डरी-सी
 
अधमरी-सी
 
सिरफिरी-सी
 
हाल कुछ समझा न पाई
 
लालपरियां
 
सांध्यवर्णी शुचि ॠचाएं
 
गुनगुनाते
 
व्योम से कुछ स्वर्णकेशी यक्ष आते
 
रंगपर्वों के निमंत्रण दे रहे हैं
 
गूंजते नभ तक प्रमादी कहकहे हैं
 
ऊर्ध्वगामी दृष्टियों के निम्न
 
स्वारथ
 
देवतामन/ॠषि पुरातन
 
सब अपावन
श्वस्तिगायन स्वस्तिगायन गा न पाईं 
लाल परियां।