तो मुझे कहाँ मालूम था कि तुम
मुझे सब्ज़-बाग़ दिखा कर
मेरे कमज़ोर कांधे की कुव्वत <ref>शक्ति</ref> देख रहे हो!
अब तो ये सवाल भी पूछूँ तो किस से पूछूँ कि
कांधे की क़ुव्वत की कमज़ोरी भी भाँपी थी?
नहीफ़ो-नाज़ार <ref>दुबला-पतला और कमज़ोर</ref> कांधे परतुम्हारी पोरों के लम्स <ref>स्पर्श</ref> का लम्बा लम्हा
दूर तक फैला हुआ है और
मैं
तन्हा <ref>अकेला</ref> खड़ा हूँ...
</poem>
{{KKMeaning}}