पूरब कथा सुनाइ सूर प्रभु गुरु-गृह बसे अकेले॥
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भावार्थ :- `निज कर चरन पखारे,' अपने हाथ से मेरे पैर धोये। इस प्रसंग पर कवि
नरोत्तमदास का बड़ा ही सुंदर सवैया है :-
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पानी परात कौ हाथ छुयौ नहिं नैनन के जल सों पग धोये॥"
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`लीन्हें....मेले' सुदामा की पत्नी ने एक फटे पुराने चिथड़े में श्रीकृष्ण के लिए