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|संग्रह=कितनी नावों में कितनी बार / अज्ञेय
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तुम सदा से <br> वह गान हो जिस की टेक-भर <br> गाने से रह गई। <br> मेरी वह फूस की मड़िया जिस का छप्पर तो <br> ::हवा के झोंकों के लिए रह गया <br> पर दीवारें सब बेमौसम की वर्षा में बह गईं... <br> यही सब हमारा नाता रिश्ता है—इसी में मैं हूँ <br> ::::और तुम हो: <br> और इतनी ही बात है जो बार-बार कही गई <br> और हर बार कही जाने में ही कही जाने से रह गई। <br> <br> <br>
::२ <br> <br> तो यों, इस लिए <br> यहीं अकेले में <br> बिना शब्दों के <br> मेरे इस हठी गीत को जागने दो, गूंजने दो <br> मौन में लय हो जाने दो: <br> यहीं <br> जहाँ कोई देखता-सुनता नहीं <br> केवल मरु का रेत-लदा झोंका <br> डँसता है और फिर एक किरकिरी <br> हँसी हँसता बढ़ जाता है— <br> यहीं <br> जहाँ रवि तपता है <br> और अपनी ही तपन से जनी धूल-कनी की <br> यवनिका में झपता है— <br> यहीं <br> जहाँ सब कुछ दीखता है, <br> और सब रंग सोख लिए गए हैं <br> इस लिए हर कोई सीखता है कि <br> सब कुछ अन्धा है। <br> जहाँ सब कुछ साँय-साँय गूंजता है <br> और निरे शोर में संयत स्वर धोखे से <br> :लड़खड़ा कर झड़ जाता है। <br> <br> <br>
::३ <br> <br> यहीं, यहीं और अभी <br> इस सधे सन्धि-क्षण में <br> इस नए जनमे, नए जागे, <br> अपूर्व, अद्वितीय—अभागे <br> मेरे पुण्यगीत को <br> अपने अन्तःशून्य में ही तन्मय हो जाने दो— <br> यों अपने को पाने दो! <br> <br> <br>
::४ <br> <br> वही, वैसे ही अपने को पा ले, नहीं तो <br> और मैंने कब, कहाँ तुम्हें पाया है? <br> हाँ—बातों के बीच की चुप्पियों में <br> हँसी में उलझ कर अनसुनी हो गई आहों में <br> भीड़ों में भटकी हुई अनाथ आँखों में <br> तीर्थों की पगडण्डियों में <br> बरसों पहले गुज़रे हुए यात्रियों की <br> दाल-बाटी की बची-बुझी राखों में! <br> <br> <br>
::५ <br> <br> उस राख का पाथेय लेकर मैं चलता हूँ— <br> उस मौन की भाषा मैं गाता हूँ: <br> उस अलक्षित, अपरिमेय निमिष में <br> :मैं तुम्हारे पास जाता हूँ, पर <br> मैं, जो होने में ही अपने को छलता हूँ— <br> यों अपने अनस्तित्व में तुम्हें पाता हूँ! <br/poem>