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हमीं नहीं खोजते, खोजती
उसे आज दुनिया सारी।
::वह प्रदीप, जिसकी लौ रण में
::पत्थर को पिघलाती है;
::लाल कीच के कमल, विजय, को
::जो पद से ठुकराती है।
आज कठिन नरमेघ! सभ्यता
ने थे क्या विषकर पाले!
लाल कीच ही नहीं, रुधिर के
दौड़ रहे हैं नद - नाले।
::अब भी कभी लहू में डूबी
::विजय विहँसती आयेगी,
::किस अशोक की आँख किन्तु,
::रो कर उसको नहलायेगी?
कहाँ अर्द्ध - नारीश वीर वे
अनल और मधु के मिश्रण?
जिनमें नर का तेज प्रबल था,
भीतर था नारी का मन?
::एक नयन संजीवन जिनका,
::एक नयन था हालाहल,
::जितना कठिन खड्ग था कर में,
::उतना ही अन्तर कोमल।
स्थूल देह की विजय आज,
है जग का सफल बहिर्जीवन;
क्षीण किन्तु, आलोक प्राण का,
क्षीण किन्तु, मानव का मन।
::अर्चा सकल बुद्धि ने पायी,
::हृदय मनुज का भूखा है;
::बढ़ी सभ्यता बहुत, किन्तु,
::अन्तःसर अब तक सूखा है।
यंत्र - रचित नर के पुतले का
बढ़ा ज्ञान दिन - दिन दूना;
एक फूल के बिना किन्तु, है--
हृदय - देश उसका सूना।
::संहारों में अचल खड़ा है
::धीर, वीर मानव ज्ञानी,
::सूखा अन्तःसलिल, आँख में
::आये क्या उसके पानी?
सब कुछ मिला नये मानव को,
एक न मिला हृदय कातर;
जिसे तोड़ दे अनायास ही
करुणा की हलकी ठोकर।
 
 
</poem>
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