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|रचनाकार=सुमित्रानंदन पंत
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वनबन- वन बन, उपवन -- छाया उन्मन- उन्मन गुंजन , नव -वय के अलियों का गुंजन !
रुपहले, सुनहले, आम्र, मौर-बौर,
नीले, पीले औ ताम्र भौंर,
रे गंध-गंध अंध हो ठौर-ठौर :उड़ पाँति-पाँति में चिर -उन्मन :करते मधु के वन बन में गुंजन !
वन बन के विटपों की डाल-डाल
कोमल कलियों से लाल-लाल,
फैली नव -मधु की रूप -ज्वाल, :जल-जल प्राणों के अलि उन्मन :करते स्पन्दन, भरतेकरते-गुंजन !
अब फैला फूलों में विकास,
मुकुलों के उर में मदिर वास,
अस्थिर सौरभ से मलय-श्वास,
:जीवन-मधु-संचय को उन्मन :करते प्राणों के अलि गुंजन !
(जनवरी, रचनाकाल: जनवरी’ 1932)
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