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साकेत / मैथिलीशरण गुप्त / समर्पण / निवेदन
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07:24, 14 मई 2010
''कोई हताश क्यों हो, आती सब की समान वारी है। ''
ध्न्य
धन्य
कमल, दिन जिसके, धन्य कुमुद, रात साथ में जिसके;
दिन और रात दोनों, होते हैं हाय! हाथ में किसके?
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