भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
Changes
Kavita Kosh से
{{KKVID|v=YmXRyh9ca0I}}
<poem>
मुँह चिढ़ाती लम्बे चौड़े पुल को सूखती नदी, ऊब चले है वर्षा की प्रतीक्षा में पैड़-पौधे भी,!
ऊब चले है वर्षा की प्रतीक्षा में पैड़-पौधे भी! पीने लगा है धरती का भी पानी प्यासा सूरज, !
निकली नहीं कन्जूस बादलों से एक भी बून्द,
तरस गये पहचान को खुद सावन-भादौ में।