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Kavita Kosh से
मुँह चिढ़ाती
लम्बे चौड़े पुल को
सूखती नदी !।
ऊब चले है
वर्षा की प्रतीक्षा में
पैड़-पौधे भी!भी।
पीने लगा है
धरती का भी पानी
प्यासा सूरज!सूरज।
निकली नहीं कन्जूस बादलों से एक भी बूँद