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झांक रहा हूं
स्मृत्यायन से -- एक सुनहले गांव की संध्या--,
मदमाती और इठलाती
और नहलाती
शुभ्र तृष्णा जल से
स्याह हुए मन को,
जो सुप्त हुआ है
हताशा में,
जिसका अंतहीन व्योम
सिकुड़ गया है
बिंदु-सरिस बुलबुले में --
फूट कर बनने के लिए
एक निराकार सत्य.