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Kavita Kosh से
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पृथ्वी के उठे उरोज मंजु पर्वत निरुपम<br>
पिक भ्रमर-गुंज भर मुखर प्राण रच रहे सधे<br>
प्रखर से प्रखरतर हुआ तपन-यौवन सहसा<br>
पुलकित शत शत व्याकुल कर भर<br>
चूमता रसा को बार बार चुम्बित दिनकर<br>
उत्कंठा से, प्रणय के नयन की समता से,<br>
दे कर, ले कर सर्वस्व प्रिया का सुक्रत मान।<br>
भीष्म से भीष्म बढ़ रहा ताप,<br>
ज्यों युग उर पर और चाप--<br>
पृथ्वी की--बहती लू; निर्जीवन<br>
कर भस्मीभूत समस्त विश्व को एक शेष,<br>
उड़ रही धूल, नीचे अदृश्य हो रहा देश।<br><br>
धर्माक्त, विरक्त पार्श्व-दर्शन से खींच नयन,<br>
चल रहा नदी-तट को करता मन में विचार--<br>
अपने भविष्य की रचना पर चल रहे सभी।'<br>
--इस तरह बहुत कुछ।<br>
आया निज इच्छित स्थल पर<br>
फिर लगा सोचने यथासूत्र--'मैं भी होता<br>
जितने रूस के भाव, मैं कह जाता अस्थिर,<br>
समझते विचक्षण ही जब वे छपते फिर-फिर,<br>
जनता की सेवा का व्रत मैं लेता अभंग;<br>
मंच पर खड़ा हो, साम्यवाद इतना उदार।<br><br>
हो गया सान्ध्य-नभ का रक्ताभ दिगन्त-फलक,<br>
खोली आँखें आतुरता से, देखा अमन्द<br>
प्रेयसी के अलक से आयी ज्यों स्निग्ध गन्ध,<br>
'आया हूँ मैं तो यहाँ अकेला, रहा बैठ' <br>
देखा फिर कर, घिर कर हँसती उपवन-बेला<br>
मस्तक पर ले कर उठी अतल की अतुल साँस,<br>
भेद कर कर्म जीवन के दुस्तर क्लेश, सुषम <br>
जैसे पार कर क्षीर सागर<br>
सिक्त-तन-केश शत लहरों पर<br>
काँपती विश्व के चकित दृश्य के दर्शन-शर।<br><br>
लोगों का जहाँ खिली हो बन कर वन्य गान!<br><br>
लघु प्याले में अतल की सुशीतलता ज्यों कर<br>
तुम करा रही हो यह सुगन्ध की सुरा पान!<br>
हो गया तुम्हारा, रुको, दूर से करो दर्श।'<br><br>
आलोक स्निग्ध भर दिखा गयी पथ जो उज्ज्वल;<br>
मैंने स्तुति की--"हे वन्य वह्नि की तन्वि-नवल,<br>
कविता में कहाँ खुले ऐसे दल दुग्ध-धवल?<br>
विश्व के प्रणयि-प्रणयिनियों का<br>
यह कहाँ--कहाँ वामालक चुम्बित पुलक गन्ध!<br>
'केवल आपा खोया, खेला<br>
कूऊ कू--ऊ' बोली कोयल, अन्तिम सुख-स्वर,<br>
'पी कहाँ पपीहा-प्रिय मधुर विष गयी छहर,<br>
पल्लव को हिला हरित बह गयी वायु,<br>
लहरों में कम्प और लेकर उत्सुक सरिता<br>
छबि बेला की नभ की ताराएँ निरुपमिता,<br>
विस्मय में भर कर रही विविध-आलोक-सृष्टि।<br><br>
चमकता सुघर बाहरी वस्तुओं को लेकर,<br>
त्यों-त्यों आत्मा की निधि पावन, बनती पत्थर।<br>
खोजो, यदि हो समतोल<br>
वहाँ कोई, विश्व के नगर-धन में।<br>
इसलिए बड़ा है एक, शेष छोटे अजान,<br>
देखना--बड़े-छोटे असमान समान वहाँ<br>
उनकी आँखों की आभा से दिग्देश स्वर्ग।<br>
बोला मैं--'यही सत्य सुन्दर।<br>
नाचती वृन्त पर तुम, ऊपर<br>
होता जब उपल-प्रहार-प्रखर<br>
तुम रहो एक मेरे उर में<br>
अपनी छबि में शुचि संचरिता।'<br><br>
मैं गया टहलता हुआ; बेल की झुका डाल<br>
जीवन प्रिय के चरणों में करने को अर्पण<br>