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<br>धीरजु मन कीन्हा प्रभु कहुँ चीन्हा रघुपति कृपाँ भगति पाई।
<br>अति निर्मल बानीं अस्तुति ठानी ग्यानगम्य जय रघुराई॥
<br>मै नारि अपावन प्रभु जग पावन रावन रिपु जन सुखदाई॥२॥सुखदाई॥<br>राजीव बिलोचन भव भय मोचन पाहि पाहि सरनहिं आई॥आई॥२॥
<br>मुनि श्राप जो दीन्हा अति भल कीन्हा परम अनुग्रह मैं माना।
<br>देखेउँ भरि लोचन हरि भवमोचन इहइ लाभ संकर जाना॥
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