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Kavita Kosh से
<poem>
'''१
इस अमावस्या की रात
सफर की तैयारी से पहले क्या तुमने
'''२
यह है मेरी धरती
जब पुरूषरूपी हवि से देवों ने यज्ञ को पसारा
'''३
चेक-अप के लिए अस्पताल में आने लगी है धरती
फूलमती की तरह कोठे से नारी निकेतन
'''४
कहाँ भटक गया मैं !
यक्षी, सुना तुमने.......... दुनिया बदल रही है
'''५
दुनिया बदल रही है
और मेरे बच्चे की टिफिन में डाल देता है
'''६
लो आ गया तुम्हारे सफर का आखिरी पड़ाव
यह शब्दों का प्रदेश है.....
कामिनी ! लोगी यह शब्दबीज
'''7७
‘शब्दों की यह खेती तुम्हें ही मुबारक।
पंचमेल ध्वनियां नहीं कहलाती नाद-ब्रह्म
बनो एक नया संवाद@ एक नया सेतु
'''8८
एक पगडंडी अनन्त
आसपास बिखरे कनेर के फूल