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विषमता के साये / सुरेश कुमार शुक्ल 'संदेश'

युग-आँगन में खडे विषमता के साये है।
देख हजूर, मजूर बहुत ही घबराये हैं।

जब से हुई सयानी बिटिया गृह मन्दिर में,
मन के नभ पर चिन्ता के बादल छाये है।

चमक रही हैं महलों में शीशे की आँखें-
झोपडियों में आँसू के सर लहराये हैं।

मुखर पाप-संगीत कर्णकटु हवेलियों में,
फुटपाथों पर गीता चाँदनी ने गाये हैं।

छपपर के पैबन्द अभी तक मुस्काते हैं
किन्तु न पावस के घन नभ से छट पाये है।

बाहर से व्यक्तित्व पुजा करता है जिनका,
अन्दर से वे लोग किसी को कब भाये हैं?

बहुत दूर है-बहुत दूर है गीत नहीं अब,
पैदल चलकर गाँव गजल के हम आये हैं।