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वृक्ष / निधि सक्सेना

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आज काट दिया एक और वृक्ष
महामानव ने
स्वार्थ और विकृत मन की बलि चढ़ा
एक और वृक्ष...

वृक्ष
वो असंख्य पक्षियों का नीड़ रहा
जिसकी गोद में बालक खेले,सधे,धन्य हुए...
जिसके नीचे उत्सव हुए मोद भरे...
जिसकी छाँव में
राम कथाएँ हुईं, कीर्तन हुए
भक्ति के रस बयार बहे
ढोलक खंजरी झालर ढाक बजे...

जो साक्षी था नेह मुग्ध युगलों के
प्रतीक्षारत प्रहरों का...

जिस पर बारिश की बूंदे
गिरती थमती झरती थीं...
जिस पर मैना
प्रेम की अंतहीन छवि गढ़ती थी...

अंधड़ में जो खड़ा रहा वज्र सा
बाहें फैलाये आश्रय देता...

जो हर ख़ुशी में झूमा गाया
बरसाए फूल...
जो हर दुःख में काँपा
रहा मौन...

आज गिरा है
निढ़ाल निश्चल निस्तेज निर्जीव
शोक मना रहे पंछी रो रो कर...

परन्तु रे मानव
तू निर्मोही संवेदनहीन
इन पशु पक्षी की छटपटाहट सुनने
तुझे अपनी ही चेतना में खोना होगा
तुझे महामानव से
पुनः मानव बनना होगा...