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वे ही हैं जीवन में अपने! / रामेश्वरलाल खंडेलवाल 'तरुण'

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वे ही हैं जीवन में अपने!

जो अंतिम क्षण बैठ सिरहाने,
हमें सुनावें कोमल गाने,
स्नेह-करों से थुपक, बुलावें नींद-लिये अंगूरी सपने!
वे ही हैं जीवन में अपने!

कोमल तकिए पर सिर रख कर-
व्यजन झलें, हौले मृदु-मन्थर!
पलक नींद से लगी-कि चिन्तातुर नाड़ी को लगे परखने!
वे ही हैं जीवन में अपने!

हमें देख जो रहते हरषे
चन्द्र-किरण-चुम्बिता लहर से!
लख उतरा मुख-लग जाते हें अन्तिम दीप-शिखा से कँपने!
वे ही हैं जीवन में अपने!